मिडिल ईस्ट के सैन्य संतुलन में पिछले 20 साल का सबसे बड़ा बदलाव होने जा रहा है। अमेरिका ने सऊदी अरब को 48 F-35 लाइटनिंग II फिफ्थ जनरेशन स्टील्थ फाइटर जेट बेचने की मंजूरी दे दी है। यह डील करीब $24.3 बिलियन यानी 2.1 से 2.3 लाख करोड़ रुपये की है और इसे अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कांग्रेस को नोटिफाई कर दिया है।
यह वही डील है जिसकी घोषणा तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने नवंबर 2025 में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की व्हाइट हाउस यात्रा के दौरान की थी। तब उन्होंने ओवल ऑफिस में कहा था, "We will be selling F-35s. They've been a great ally." अब वो वादा औपचारिक अप्रूवल में बदल गया है।
डील में क्या है?
सिर्फ जेट नहीं, यह एक फुल पैकेज है:
1. 48 F-35A वेरिएंट एयरक्राफ्ट
2. 49 Pratt & Whitney F135 इंजन (एक स्पेयर)
3. एडवांस्ड एवियोनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट
4. सिक्योर कम्युनिकेशन सिस्टम, हथियार, स्पेयर पार्ट्स और कई साल तक मेंटेनेंस और ट्रेनिंग सपोर्ट
एक F-35A की फ्लाई-अवे कॉस्ट आज लगभग $82-100 मिलियन है, लेकिन हथियार और लाइफ-साइकल सपोर्ट जोड़ने पर कीमत कई गुना बढ़ जाती है।
यह डील एक और बड़े पैकेज का हिस्सा है। उसी विजिट में अमेरिका और सऊदी ने सिविल न्यूक्लियर एनर्जी कोऑपरेशन पर जॉइंट डिक्लेरेशन साइन किया था, जो दशकों लंबी पार्टनरशिप का लीगल फ्रेमवर्क है। साथ ही सऊदी ने अमेरिका में अपना इन्वेस्टमेंट कमिटमेंट $600 बिलियन से बढ़ाकर लगभग $1 ट्रिलियन करने का वादा किया था।
सऊदी अरब को F-35 क्यों चाहिए?
सऊदी एयरफोर्स के पास अभी F-15SA, यूरोफाइटर टाइफून और टोर्नेडो जैसे चौथी पीढ़ी के फाइटर हैं। लेकिन उसके दो सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी ईरान और इजरायल के सामने उसे नई बढ़त चाहिए।
ईरान ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम में तेजी से आगे बढ़ रहा है, और रूस से Su-35 खरीदने की कोशिश में है। वहीं दूसरी तरफ इजरायल के पास 39 से ज्यादा F-35I "Adir" हैं और वह इस क्षेत्र में अब तक इस जेट का इकलौता ऑपरेटर है। सऊदी लंबे समय से कह रहा था कि उसे भी उसी स्तर की तकनीक चाहिए।
विजन 2030 के तहत MBS सऊदी सेना को सिर्फ तेल-धन से खरीदी हुई सेना से बदलकर हाई-टेक फोर्स बनाना चाहते हैं।
अमेरिका के लिए ये नीति में U-टर्न क्यों है?
अमेरिका ने F-35 की बिक्री हमेशा अपने सबसे करीबी सहयोगियों तक ही सीमित रखी है - NATO देश, इजरायल, जापान, साउथ कोरिया, ऑस्ट्रेलिया। 2019 में अमेरिका ने अपने NATO पार्टनर तुर्की को भी इस प्रोग्राम से निकाल दिया था, क्योंकि तुर्की ने रूस से S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा था। वाशिंगटन को डर था कि S-400 के रडार F-35 की स्टील्थ प्रोफाइल का डेटा इकट्ठा कर लेंगे और वह डेटा मास्को तक पहुंच जाएगा।
सऊदी को बेचना इसी सिद्धांत का उलट है। इसलिए इसे एक बड़ा पॉलिटिकल सिग्नल माना जा रहा है। अमेरिका मध्य-पूर्व में चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहता है। सऊदी अरब पिछले कुछ सालों में चीन से ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइल टेक्नोलॉजी और यहां तक कि निगरानी सिस्टम खरीद रहा था। वाशिंगटन का तर्क है कि अगर सऊदी को F-35 नहीं दिया गया, तो वह J-35 जैसा चीनी 5th-gen फाइटर खरीद सकता है।
तीन बड़े विवाद
1. चीन को टेक्नोलॉजी लीक का डर
अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसियों और पेंटागन के कुछ अधिकारियों ने इस डील पर आपत्ति जताई है। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें चिंता है कि सऊदी अरब में काम कर रहे चीनी टेक्नीशियन या चीनी मूल के हुवावे 5G नेटवर्क के जरिए F-35 के संवेदनशील डेटा, रडार सिग्नेचर और मेंटेनेंस कोड्स तक पहुंच सकते हैं। F-35 सिर्फ एक फाइटर नहीं, एक फ्लाइंग कंप्यूटर है, इसका ALIS/ODIN लॉजिस्टिक्स सिस्टम लगातार अमेरिका से जुड़ा रहता है।
2. इजरायल की QME - Qualitative Military Edge
अमेरिकी कानून के अनुसार, अमेरिका को मध्य-पूर्व में किसी भी देश को हथियार बेचने से पहले यह सुनिश्चित करना होता है कि इजरायल की गुणात्मक सैन्य बढ़त बनी रहे। इजरायल ने सार्वजनिक रूप से इस डील का विरोध नहीं किया है, लेकिन इजरायली सुरक्षा प्रतिष्ठान में चिंता है कि अगर सऊदी पायलट F-35 उड़ाएंगे, तो इजरायली एयरफोर्स की अनदेखी घुसपैठ करने की क्षमता कम हो जाएगी। इसीलिए अमेरिका सऊदी को दिए जाने वाले जेट में कुछ डाउनग्रेडेड सिस्टम देने और इजरायल को और अधिक एडवांस्ड F-35 और F-15EX देने पर विचार कर रहा है।
3. कांग्रेस और मानवाधिकार
अमेरिकी कांग्रेस में, विशेष रूप से डेमोक्रेट्स के बीच, सऊदी अरब को लेकर यमन युद्ध और पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या को लेकर अविश्वास है। हालांकि ट्रंप प्रशासन के समय कांग्रेस ने ज्यादा विरोध नहीं किया था, लेकिन अंतिम डिलीवरी में 3-4 साल लगेंगे और तब तक राजनीतिक माहौल बदल सकता है।
F-35 आखिर है क्या?
लॉकहीड मार्टिन द्वारा बनाया गया F-35 दुनिया का सबसे महंगा हथियार प्रोग्राम है। 1990 में शुरू हुए इस प्रोग्राम में अब तक 1200 से ज्यादा जेट बन चुके हैं। इसकी तीन खासियतें हैं:
- स्टील्थ: रडार पर लगभग अदृश्य
- सेंसर फ्यूजन: यह 360 डिग्री में दुश्मन के टारगेट को देखकर सारी जानकारी पायलट के हेलमेट में दिखाता है
- नेटवर्क सेंट्रिक वारफेयर: यह अकेले लड़ने के बजाय पूरी सेना के लिए आंख और दिमाग का काम करता है
इसकी एक उड़ान का खर्च लगभग $33,000 प्रति घंटा है।
आगे क्या होगा?
मंजूरी का मतलब तुरंत डिलीवरी नहीं है। पहले 30 दिन का कांग्रेस नोटिफिकेशन पीरियड चलेगा। उसके बाद कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशन, और फिर लॉकहीड की फोर्ट वर्थ फैक्ट्री में प्रोडक्शन स्लॉट मिलेगा। सऊदी को पहला जेट 2028-2029 से पहले मिलने की उम्मीद नहीं है।
लेकिन संदेश साफ है। अमेरिका अब मध्य-पूर्व में "इजरायल-ओनली F-35 क्लब" की नीति खत्म कर रहा है। यह न सिर्फ एक हथियार बिक्री है, बल्कि अमेरिका का सऊदी अरब को चीन के कैंप में जाने से रोकने और अगले 30 साल तक अपने रक्षा इकोसिस्टम से बांधे रखने की रणनीति है। ₹2.3 लाख करोड़ की यह डील आने वाले वर्षों में ईरान, इजरायल और पूरे खाड़ी क्षेत्र के पावर बैलेंस को नए सिरे से लिखेगी।

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